1मतलब
Indian Succession Act, 1925 के मुताबिक "executor" वह व्यक्ति है, जिसे वसीयत करने वाला (testator) अपनी आख़िरी वसीयत को अमल में लाने का काम सौंपता है।[1]
Executor मृतक का legal representative होता है, हर काम के लिए, और मृतक की सारी संपत्ति इसी हैसियत से उसमें निहित (vest) हो जाती है। मृतक हिंदू, मुसलमान, बौद्ध, सिख, जैन या पारसी हो, या exempted person हो, तो वह संपत्ति executor में निहित नहीं होती, जो वैसे survivorship से किसी और को चली जाती।[1]
2Executor कैसे बनता है
Executor मृतक की मृत्यु से एक साल पूरा होने तक कोई legacy देने के लिए बाध्य नहीं है।
- वसीयत से नियुक्ति: Probate सिर्फ़ उस executor को दिया जाता है, जिसे वसीयत में नियुक्त किया गया हो। नियुक्ति साफ़ शब्दों में भी हो सकती है, और ज़रूरी निहितार्थ (necessary implication) से भी।[1]
- किसे probate नहीं मिल सकता: नाबालिग को, unsound mind वाले व्यक्ति को, और व्यक्तियों के किसी association को; जब तक वह ऐसी company न हो, जो राज्य सरकार के नियमों की शर्तें पूरी करती हो।[1]
- कई executor: probate सबको एक साथ या अलग-अलग समय पर दिया जा सकता है। उनमें से एक की मृत्यु हो जाए, तो पूरा प्रतिनिधित्व बचे हुए executor या executors के पास आ जाता है।[1]
- काम छोड़ना: executor यह काम छोड़ सकता है: Judge के सामने ज़बानी, या दस्तख़त की हुई लिखत से। छोड़ने के बाद वह उस वसीयत का probate कभी नहीं माँग सकता।[1]
- छोड़ दे, या तय समय में न माने: तब वसीयत साबित की जा सकती है, और वसीयत की copy के साथ letters of administration उस व्यक्ति को दिए जा सकते हैं, जिसे बिना वसीयत की स्थिति में administration का हक़ होता।[1]
- वसीयत में executor न हो: universal या residuary legatee को वसीयत साबित करने दिया जा सकता है, और उसे वसीयत के साथ letters of administration दिए जा सकते हैं।[1]
3Executor के काम
- अंतिम संस्कार: मृतक ने काफ़ी संपत्ति छोड़ी हो, तो उसके ज़रूरी अंतिम संस्कार के लिए पैसा देना executor का कर्तव्य है।[1]
- संपत्ति इकट्ठा करना: उसे वाजिब मेहनत से मृतक की संपत्ति, और मृत्यु के समय मृतक को मिलने वाले क़र्ज़, इकट्ठा करने हैं।[1]
- Inventory, छह महीने में: probate मिलने के छह महीने के भीतर उसे अदालत में inventory देनी है, जिसमें उसके क़ब्ज़े की सारी संपत्ति, सारे credits और उसे मिलने वाले सारे क़र्ज़ों का पूरा और सच्चा अनुमान हो।[1]
- हिसाब, एक साल में: probate मिलने के एक साल के भीतर उसे संपत्ति का हिसाब (account) देना है: उसके हाथ क्या आया, और उसका क्या किया गया। अदालत दोनों के लिए और समय दे सकती है।[1]
- क़र्ज़ पहले, legacy बाद में: हर तरह का क़र्ज़ किसी भी legacy से पहले चुकाना है।[1]
4पैसा किस क्रम में चुकता है
- सबसे पहले: वाजिब funeral ख़र्च, और death-bed charges, जैसे इलाज की fees और मृत्यु से पहले के एक महीने का रहने-खाने का ख़र्च।[1]
- उसके बाद: probate या letters of administration पाने का ख़र्च, संपत्ति सँभालने के लिए ज़रूरी अदालती कार्यवाही के ख़र्च समेत।[1]
- फिर मज़दूरी: मज़दूर, कारीगर या घरेलू नौकर की वह मज़दूरी, जो मृत्यु से ठीक पहले के तीन महीनों की सेवा की बाक़ी हो।[1]
- फिर बाक़ी क़र्ज़: किसी क़र्ज़ देने वाले को दूसरे पर तरजीह नहीं; executor को अपनी जानकारी के सारे क़र्ज़ बराबरी से और अनुपात में चुकाने हैं, जहाँ तक संपत्ति पहुँचे।[1]
- आख़िर में legacy: legatee का हक़ पूरा होने के लिए executor की सहमति (assent) ज़रूरी है। Executor मृत्यु से एक साल पूरा होने तक कोई legacy देने के लिए बाध्य नहीं है।[1]
5Executor के अधिकार और सीमाएँ
- मुक़दमा और वसूली: जो दावे मृतक के बाद भी बने रहते हैं, उनके लिए executor वैसे ही मुक़दमा कर सकता है और क़र्ज़ वसूल सकता है, जैसे मृतक जीते-जी कर सकता था।[1]
- संपत्ति निपटाना: executor अपने पास आई संपत्ति को, पूरी या आंशिक, अपने विवेक से निपटा सकता है। मृतक हिंदू, मुसलमान, बौद्ध, सिख या जैन हो, या exempted person हो, तो अचल संपत्ति के मामले में वसीयत में लगाई गई पाबंदी लागू रहती है, जब तक probate देने वाली अदालत लिखित आदेश से इजाज़त न दे।[1]
- ख़ुद नहीं ख़रीद सकता: executor सीधे या घुमाकर मृतक की संपत्ति का कोई हिस्सा ख़रीदे, तो वह बिक्री उस संपत्ति में हित रखने वाले किसी भी दूसरे व्यक्ति के कहने पर रद्द कराई जा सकती है।[1]
- Commission की सीमा: वह उस दर से ज़्यादा commission या agency charges नहीं ले सकता, जो उस समय Administrator-General के लिए तय हो।[1]
- कई executor हों: कोई उलटा निर्देश न हो, तो सबके अधिकार उनमें से कोई एक भी इस्तेमाल कर सकता है, जिसने वसीयत साबित कर दी हो।[1]
- बीच के काम: probate मिलने पर executor के बीच के सारे काम मान्य हो जाते हैं।[1]
6आम ग़लतफ़हमी
7आपका अधिकार
- लापरवाही भी: संपत्ति का कोई हिस्सा वसूलने में executor की लापरवाही से नुकसान हो, तो वह रकम भी उसे भरनी है।[1]
- अदालत में हिसाब: executor को inventory और संपत्ति का हिसाब, दोनों अदालत में देने हैं।[1]
- बिना अधिकार दख़ल: जब कोई सही executor या administrator न हो, और कोई व्यक्ति मृतक की संपत्ति में दख़ल दे, तो वह "executor of his own wrong" बन जाता है, और उसके हाथ आई संपत्ति की हद तक जवाबदेह होता है। संपत्ति बचाने, अंतिम संस्कार या परिवार की फ़ौरी ज़रूरत के लिए सामान छूना इसमें नहीं आता।[1]
8अभी क्या करें
- वसीयत बना रहे हों, तो executor ऐसा व्यक्ति चुनिए, जो नाबालिग न हो, और जिसे probate मिल सकता हो।[1]
- आपको executor बनाया गया हो और यह काम न करना हो, तो उसे Judge के सामने या लिखकर छोड़िए; छोड़ने के बाद probate नहीं माँगा जा सकता।[1]
- Executor हों, तो probate मिलने के छह महीने में inventory और एक साल में हिसाब अदालत में देना याद रखिए।[1]
- वारिस या legatee हों, तो याद रखिए कि क़र्ज़ legacy से पहले चुकते हैं, और executor मृत्यु से एक साल तक legacy देने के लिए बाध्य नहीं है।[1]
9सवाल-जवाब
10जुड़े शब्द
11स्रोत
- India Code — The Indian Succession Act, 1925 (Act No. 39 of 1925), पाठ "As on the 19th June, 2026" ↗किस बात के लिए, दस्तावेज़ का कौन-सा हिस्सा
- धारा 2(a) और 2(c)administrator और executor की परिभाषा
- धारा 211executor मृतक का legal representative; संपत्ति उसमें निहित; survivorship का अपवाद
- धारा 222, 223 और 224probate सिर्फ़ नियुक्त executor को; किसे नहीं मिल सकता; कई executor
- धारा 226 और 227बचे हुए executor को प्रतिनिधित्व; probate से बीच के काम मान्य
- धारा 230 और 231काम छोड़ना; छोड़ने पर letters of administration
- धारा 232वसीयत में executor न हो
- धारा 303 और 304executor of his own wrong और उसकी जवाबदेही
- धारा 305 और 307मुक़दमा और वसूली का अधिकार; संपत्ति निपटाने का अधिकार और उसकी पाबंदियाँ
- धारा 309, 310 और 311commission की सीमा; ख़ुद ख़रीदी संपत्ति; कई executors के अधिकार
- धारा 316, 317 और 319अंतिम संस्कार; inventory और हिसाब; संपत्ति और क़र्ज़ इकट्ठा करना
- धारा 320 से 323 और 325भुगतान का क्रम; क़र्ज़ legacy से पहले
- धारा 332 और 337legacy के लिए executor की सहमति; एक साल
- धारा 368 और 369नुकसान और लापरवाही की भरपाई
12सुधार का इतिहास
- पन्ना बना। Indian Succession Act, 1925 (India Code का पाठ, 19 जून 2026 तक) से जाँचा।
पन्ना बना: 07 अक्तू 2026 · आख़िरी जाँच: 07 अक्तू 2026
यह सामान्य जानकारी है, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं।