1मतलब
Indian Succession Act, 1925 के Part X का नाम 'Succession Certificates' है। इसके तहत District Judge मृतक के debts और securities के बारे में certificate देता है। Debt, यानी वह रकम जो मृतक को किसी से मिलनी बाक़ी थी।[1] RBI के निर्देशों में bank के दावों के काग़ज़ों में यह "Succession Certificate" नाम से आता है।[2]
Act की धारा 2 की परिभाषाओं में यह शब्द नहीं है। Part X बताता है कि certificate किस बारे में दिया जाता है, कौन देता है और उसका असर क्या है।[1]
2इसका मतलब आपके लिए क्या है
- Nominee हो, तो नहीं लगता: nominee या survivor को भुगतान करते समय bank Succession Certificate, Letter of Administration या Probate of Will जैसे काग़ज़ नहीं माँग सकता।[2]
- ₹15 लाख की सीमा तक नहीं: nominee न हो, तो दावा क़ानूनी वारिस करते हैं। तब कोई वसीयत, आपसी विवाद या अदालत की रोक भी न हो, तो ₹15 लाख (या bank की तय की हुई इससे ऊँची सीमा) तक के दावे के लिए RBI के निर्देशों में जो काग़ज़ गिनाए गए हैं, उनमें Succession Certificate नहीं है।[2]
- सीमा से ऊपर, दो रास्ते: पहला रास्ता Succession Certificate है, साथ में claim form, death certificate और पहचान का काग़ज़। दूसरे रास्ते में इसकी जगह Legal Heir Certificate, या शपथ लेकर दिया गया एक स्वतंत्र व्यक्ति का affidavit लगता है; तब indemnity bond और बाक़ी वारिसों का no-objection भी लगता है, और bank तीसरे व्यक्ति का surety bond माँग सकता है।[2]
- विवाद हो, तो: bank Probate of Will, Letter of Administration, Succession Certificate या अदालत के आदेश के आधार पर दावा निपटाता है।[2]
- Locker: nominee या survivor से ऐसे काग़ज़ नहीं लगते, जब तक nomination में कोई discrepancy न हो। Nominee न हो और वारिसों में विवाद न हो, तो bank सरल प्रक्रिया अपनाता है, और उसमें भी Succession Certificate नहीं लेता।[2]
- मृत क़र्ज़दार की दूसरी assets: इन्हें वारिसों को लौटाने के लिए bank legal representation पर ज़ोर नहीं दे सकता, रकम चाहे जितनी हो। Succession certificate वह तब माँग सकता है, जब विवाद हो और सभी वारिस मिलकर bank को indemnify न करें, या कुछ ख़ास मामलों में, जब bank को वाजिब शक हो कि दावा करने वाले ही अकेले वारिस हैं या नहीं।[2]
3Succession Certificate किस बारे में होता है
- Debts: अर्ज़ी मृतक के किसी एक debt, कई debts, या उनके किसी हिस्से के लिए दी जा सकती है।[1]
- Securities: Part X में "security" का मतलब है: केंद्र या राज्य सरकार का promissory note, debenture, stock या दूसरी security; किसी company या दूसरी incorporated संस्था का stock, debenture या share; किसी local authority का, या उसकी ओर से जारी, debenture या पैसे की दूसरी security; और वह security, जिसे राज्य सरकार Official Gazette में notification से इस Part के लिए security घोषित करे।[1]
- अदालत से वसूली: धारा 214 के मुताबिक अदालत मृतक के किसी देनदार के ख़िलाफ़ उसके debt के भुगतान की decree तब तक पास या execute नहीं करती, जब तक उत्तराधिकार के आधार पर हक़ जताने वाला व्यक्ति probate, letters of administration, वह succession certificate जिसमें वह debt लिखा हो, या धारा में गिनाया गया कोई दूसरा certificate पेश न करे। इस धारा के "debt" में खेती की ज़मीन का किराया, revenue या मुनाफ़ा नहीं आता।[1]
- कब नहीं दिया जाता: धारा 370 के मुताबिक उस debt या security के लिए certificate नहीं दिया जाता, जिस पर हक़ धारा 212 के तहत letters of administration से साबित करना ज़रूरी हो। धारा 212 का यह नियम Hindu, Muhammadan, Buddhist, Sikh, Jaina, Indian Christian या Parsi के मामले में लागू नहीं होता।[1]
4Succession Certificate कैसे मिलता है
कुछ मामलों में Judge को certificate देने से पहले bond या दूसरी security लेनी ही होती है; बाक़ी में वह ले सकता है।
- कौन देता है: वह District Judge, जिसके अधिकार-क्षेत्र में मृतक मृत्यु के समय आम तौर पर रहता था। उस समय उसका कोई तय घर न हो, तो वह District Judge, जिसके अधिकार-क्षेत्र में मृतक की संपत्ति का कोई हिस्सा मिले।[1]
- नीचे की अदालत भी: धारा 388 के मुताबिक राज्य सरकार Official Gazette में notification से District Judge से नीचे की किसी अदालत को भी यह काम दे सकती है। Act के पाठ के मुताबिक Karnataka में यह धारा हटा दी गई है।[1]
- Petition में क्या: मृत्यु का समय; मृत्यु के समय मृतक कहाँ आम तौर पर रहता था; उसका परिवार या दूसरे क़रीबी रिश्तेदार और उनके पते; petitioner किस हक़ से दावा कर रहा है; कि certificate देने में कोई क़ानूनी रुकावट नहीं है; और वे debts और securities, जिनके लिए certificate माँगा जा रहा है।[1]
- दस्तख़त और verification: petition पर applicant के, या उसकी ओर से, दस्तख़त और verification उसी तरह होते हैं, जैसे Code of Civil Procedure, 1908 में plaint के लिए तय है।[1]
- Notice और सुनवाई: Judge को अर्ज़ी सुनने का आधार दिखे, तो वह सुनवाई का दिन तय करता है। अर्ज़ी और उस दिन का notice उन लोगों को भेजा जाता है, जिन्हें Judge की राय में ख़ास notice मिलना चाहिए, और court-house की किसी साफ़ दिखने वाली जगह पर लगाया जाता है। फिर Judge summary तरीके से तय करता है कि certificate का हक़ किसका है।[1]
- पेचीदा सवाल हो: हक़ तय करने के लिए क़ानून या तथ्य के ऐसे सवाल सुलझाने पड़ें, जो summary कार्यवाही के लिए बहुत पेचीदा हों, तब भी Judge उस applicant को certificate दे सकता है, जिसका हक़ prima facie सबसे मज़बूत दिखे।[1]
- कई applicant हों: और Judge को लगे कि उनमें से एक से ज़्यादा का मृतक की संपत्ति में हित है, तो वह हित की मात्रा और दूसरी बातों में applicant की fitness देखकर तय कर सकता है कि certificate किसे दे।[1]
- Bond या security: ऊपर के दोनों मामलों में Judge को certificate देने से पहले surety के साथ bond, या दूसरी काफ़ी security लेनी ही होती है; बाक़ी मामलों में वह ले सकता है। यह मिले हुए debts और securities का हिसाब देने, और उन लोगों की indemnity के लिए होती है, जो उनके हक़दार हो सकते हैं।[1]
- Court-fee: अर्ज़ी के साथ उतनी रकम जमा होती है, जितनी Court-Fees Act, 1870 के तहत certificate की fee बनती है।[1]
5Succession Certificate का असर
- देनदारों के सामने conclusive: certificate में लिखे debts और securities के बारे में वह उन लोगों के सामने conclusive है, जिन पर वे debts बकाया हैं या जो उन securities पर ज़िम्मेदार हैं।[1]
- भुगतान करने वाले को पूरी indemnity: जो लोग certificate पाने वाले को सच्चे मन से (good faith) भुगतान करते हैं, या उसके साथ लेन-देन करते हैं, उन्हें पूरी indemnity मिलती है।[1]
- पूरे भारत में: Part X के तहत दिया गया certificate पूरे भारत में असर रखता है।[1]
- Securities पर अधिकार: Judge certificate में यह अधिकार दे सकता है कि पाने वाला securities पर ब्याज या dividend ले, उन्हें negotiate या transfer करे, या दोनों काम करे।[1]
- पहले से grant हो, तो: उसी मृतक की संपत्ति के बारे में पहले से कोई certificate, probate या letters of administration दिया जा चुका हो और वह लागू हो, तो बाद का certificate अमान्य होता है; Act में दिए अपवाद अलग हैं।[1]
- बाद में probate या letters of administration मिलें: तो वे उस संपत्ति के debts और securities के बारे में पहले दिए गए certificate की जगह ले लेते हैं। जिन्होंने इसकी जानकारी के बिना certificate धारक को भुगतान किया, उनके भुगतान मान्य रहते हैं।[1]
- हक़ का सवाल खुला रहता है: Part X के तहत हुआ फ़ैसला उन्हीं पक्षों के बीच उसी सवाल पर मुक़दमे को नहीं रोकता। जिसने debt या security ली है, वह उस व्यक्ति को हिसाब देने का ज़िम्मेदार रहता है, जो क़ानूनन उसका हक़दार है।[1]
6आम ग़लतफ़हमी
7आपका अधिकार
- Appeal: District Judge के certificate देने, मना करने या रद्द करने के आदेश के ख़िलाफ़ High Court में appeal हो सकती है।[1]
- Locker में Bond of Indemnity नहीं: locker का दावा Probate of Will, Succession Certificate, Letter of Administration या अदालत के आदेश जैसे काग़ज़ों पर निपटे, तो Bond of Indemnity नहीं देना होता।[2]
- काग़ज़ों की सूची: bank को अपनी website पर बताना है कि किस हालत में दावे के लिए कौन-से काग़ज़ लगेंगे।[2]
8अभी क्या करें
- दावा bank का हो, तो पहले bank की website या शाखा से पता कीजिए कि आपके मामले में कौन-से काग़ज़ लगेंगे।[2]
- Certificate लेना हो, तो petition उस District Judge की अदालत में जाती है, जिसके अधिकार-क्षेत्र में मृतक आम तौर पर रहता था।[1]
- Petition में वे सारे debts और securities लिखिए, जिनके लिए certificate चाहिए; certificate में वही लिखे जाते हैं।[1]
- कोई debt या security छूट जाए, तो बाद में certificate को extend कराने की अर्ज़ी दी जा सकती है।[1]
- मृतक के परिवार और क़रीबी रिश्तेदारों के नाम-पते तैयार रखिए; court-fee के बराबर रकम अर्ज़ी के साथ जमा होती है।[1]
9सवाल-जवाब
10जुड़े शब्द
11स्रोत
- India Code — The Indian Succession Act, 1925 (Act No. 39 of 1925), पाठ "As on the 19th June, 2026" ↗किस बात के लिए, दस्तावेज़ का कौन-सा हिस्सा
- धारा 2 और Part Xधारा 2 की परिभाषाओं में यह शब्द नहीं; Part X का नाम 'Succession Certificates'
- धारा 212 और 370किस debt या security के लिए certificate नहीं दिया जाता; "security" का मतलब
- धारा 214, 215 और 220अदालत से वसूली के लिए कौन-से काग़ज़; बाद का probate या letters of administration; letters of administration का असर
- धारा 371 और 388कौन-सा District Judge; District Judge से नीचे की अदालत
- धारा 372petition में क्या लिखा जाता है; verification; debts के हिस्से के लिए अर्ज़ी
- धारा 373notice; summary सुनवाई; पेचीदा सवाल; कई applicant
- धारा 374 और 376certificate में क्या लिखा जाता है; securities पर अधिकार; extension
- धारा 375 और 379bond या security; court-fee की रकम
- धारा 380 और 381पूरे भारत में असर; conclusive; पूरी indemnity
- धारा 383 और 384रद्द होने के पाँच कारण; High Court में appeal
- धारा 385, 386 और 387पहले से grant हो; अनजाने में किए भुगतान; हक़ का सवाल और हिसाब देने की ज़िम्मेदारी
- धारा 389supersede या अमान्य हुआ certificate लौटाना; जुर्माना
- RBI — Reserve Bank of India (Commercial Banks – Responsible Business Conduct) Directions, 2025 (RBI/DOR/2025-26/170; Updated as on October 1, 2026) ↗किस बात के लिए, दस्तावेज़ का कौन-सा हिस्सा
- पैरा 286nominee या survivor से Succession Certificate जैसे काग़ज़ नहीं माँगे जा सकते
- पैरा 287, 288 और 290nominee न हो: ₹15 लाख की सीमा तक के काग़ज़; सीमा से ऊपर के दो रास्ते
- पैरा 293विवाद वाले दावों में Succession Certificate
- पैरा 306, 308, 309 और 313locker: nominee हो; सरल प्रक्रिया; Bond of Indemnity कब नहीं
- पैरा 316काग़ज़ों की सूची और प्रक्रिया bank की website पर
- पैरा 361मृत क़र्ज़दार की दूसरी assets और succession certificate
12सुधार का इतिहास
- पन्ना बना। India Code पर Indian Succession Act, 1925 के पाठ (19 जून 2026 तक का) और RBI के Commercial Banks – Responsible Business Conduct Directions, 2025 (1 अक्टूबर 2026 तक update) से जाँचा।
पन्ना बना: 07 अक्तू 2026 · आख़िरी जाँच: 07 अक्तू 2026
यह सामान्य जानकारी है, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं।