Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 · क़र्ज़ न चुका पाने वाली कंपनियों और लोगों के मामलों को तय समय में सुलझाने का क़ानून
एक लाइन में
IBC यानी Insolvency and Bankruptcy Code, 2016। प्रस्तावना के मुताबिक यह कंपनियों, partnership firms और व्यक्तियों के पुनर्गठन (reorganisation) और insolvency resolution से जुड़े क़ानूनों को एक जगह लाता है, ताकि मामले तय समय में निपटें और संपत्ति की क़ीमत ज़्यादा-से-ज़्यादा बचे। कंपनी के मामले में क़र्ज़ न चुकाने (default) पर NCLT के पास 'corporate insolvency resolution process' (CIRP) शुरू करने की अर्ज़ी दी जा सकती है।
क़ानूनAct No. 31 of 201628 मई 2016
कंपनी के लिए न्यूनतम default₹1 करोड़धारा 4
CIRP की समय-सीमा180 दिनएक बार 90 दिन तक बढ़ सकती है
Adjudicating Authority (कंपनी)NCLTधारा 60
1मतलब
IBC यानी Insolvency and Bankruptcy Code, 2016। Insolvency का मतलब है क़र्ज़ न चुका पाने की हालत। Code की प्रस्तावना के मुताबिक यह कंपनियों, partnership firms और व्यक्तियों के पुनर्गठन और insolvency resolution से जुड़े क़ानूनों को एक जगह लाता और बदलता है, ताकि मामले तय समय में निपटें, संपत्ति की क़ीमत ज़्यादा-से-ज़्यादा बचे, उद्यम और क़र्ज़ की उपलब्धता बढ़े, और सभी पक्षों के हितों में संतुलन रहे।[1]
2Insolvency process कैसे चलती है
कंपनी ने default कियाकम-से-कम ₹1 करोड़
धारा 7 / 10→
NCLT में अर्ज़ीfinancial creditor या कंपनी ख़ुद
अर्ज़ी मंज़ूर→insolvency commencement
CIRP180 दिन; moratorium
धारा 14 के मुताबिक insolvency commencement की तारीख़ पर NCLT moratorium का आदेश देता है: कंपनी के ख़िलाफ़ मुक़दमे, उसकी संपत्ति बेचना और SARFAESI समेत security interest की वसूली उस दौरान रुकती है।
3आम ग़लतफ़हमी
✕ ग़लतफ़हमी"IBC में मामला सालों खिंच सकता है, कोई सीमा नहीं।"
✓ सचधारा 12 के मुताबिक CIRP अर्ज़ी मंज़ूर होने से 180 दिन में पूरा होना है; committee of creditors के 66% वोट पर NCLT एक बार, ज़्यादा-से-ज़्यादा 90 दिन बढ़ा सकता है; और insolvency commencement से 330 दिन में अनिवार्य रूप से पूरा होना है (मुक़दमेबाज़ी का समय मिलाकर)।[1]
✕ ग़लतफ़हमी"छोटे-से default पर भी कंपनी IBC में चली जाती है।"
✓ सचनहीं। धारा 4 के मुताबिक कंपनियों वाला हिस्सा तभी लागू होता है, जब default कम-से-कम ₹1 करोड़ का हो।[1]
4परीक्षा के लिए
याद रखने लायक़: IBC 2016 (Act No. 31, 28.5.2016); कंपनी के लिए न्यूनतम default ₹1 करोड़ (धारा 4); धारा 7 financial creditor, धारा 10 कंपनी ख़ुद; CIRP 180 दिन + एक बार 90 दिन, कुल 330 दिन अनिवार्य (धारा 12); moratorium धारा 14; NCLT धारा 60; IBBI धारा 188। इस तरह के बाक़ी शब्द परीक्षा के लिए पन्ने पर हैं।[1]
5सवाल-जवाब
IBC आसान भाषा में क्या है?जब कोई कंपनी अपना क़र्ज़ नहीं चुका पाती, तो उसे बचाने (resolution) या आख़िर में बंद करके (liquidation) क़र्ज़ देने वालों में बाँटने का तय-समय वाला तरीक़ा। IBC व्यक्तियों और partnership firms के लिए भी है।[1]
CIRP कौन शुरू कर सकता है?धारा 7 के मुताबिक financial creditor (अकेले या दूसरों के साथ), default होने पर; और धारा 10 के मुताबिक default करने वाली कंपनी ख़ुद (corporate applicant)। Operational creditor के लिए Code में अलग धारा है।[1]
NCLT का क्या रोल है?धारा 60 के मुताबिक कंपनियों (और उनके personal guarantors) के insolvency और liquidation मामलों में Adjudicating Authority वह National Company Law Tribunal है, जिसके इलाक़े में कंपनी का registered office है।[1]
IBBI क्या है?धारा 188 के मुताबिक Insolvency and Bankruptcy Board of India, जिसका मुख्यालय National Capital Region में है। धारा 196 के मुताबिक यह insolvency professionals, उनकी agencies और information utilities को register और regulate करता है।[1]