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शब्द · क़र्ज़✓ स्रोत से जाँचा · 12 Oct 2026

Loan Settlement

क़र्ज़ का समझौता · bank बकाये का कुछ हिस्सा छोड़कर नक़द में पूरा हिसाब निपटाता है

एक लाइन में

Loan settlement (RBI की भाषा में compromise settlement) यानी bank और borrower के बीच बातचीत से तय ऐसा इंतज़ाम, जिसमें bank के सारे दावे नक़द में पूरी तरह निपटाए जाते हैं, और bank बकाये का कुछ हिस्सा छोड़ सकता है। यह borrower का अधिकार नहीं, bank का फ़ैसला है; और चुकाने में असमर्थता से छूट मिली हो, तो credit report में खाता 'settled' दिखता है।

Settlement का हक़नहींbank अपने व्यापारिक फ़ैसले से करता है
Credit report में'Settled'असमर्थता से मूलधन / ब्याज में छूट मिली हो
उसी bank से नया loan12 महीने बादकम से कम; खेती के क़र्ज़ में bank की policy
Settlement रक़म चुकाने का समय3 महीने तकइससे ज़्यादा हो, तो restructuring माना जाता है

मतलब

Loan settlement को RBI के निर्देशों में compromise settlement कहा गया है: borrower के साथ बातचीत से तय ऐसा इंतज़ाम, जिसमें bank के सारे दावे नक़द में पूरी तरह निपटा दिए जाते हैं। इसमें bank बकाये का कुछ हिस्सा छोड़ सकता है, और उतने दावे से हाथ खींच लेता है।[1]

  • किसके नियम: ये नियम commercial banks के हैं; small finance, payments और local area banks पर ये निर्देश लागू नहीं।[1][2] NBFC के लिए RBI के अलग निर्देश हैं।[3]
  • Write-off अलग चीज़: technical write-off सिर्फ़ bank के खातों का हिसाब है; इसमें borrower पर दावा नहीं छूटता।[1]

इसका मतलब आपके लिए क्या है

  • हक़ नहीं: settlement borrower का अधिकार नहीं; bank इसे अपने व्यापारिक फ़ैसले से करता है।[1]
  • Credit report पर असर: चुकाने में असमर्थता की वजह से मूलधन या ब्याज में छूट मिली हो, तो bank credit bureau को खाता 'settled' बताता है।[2]
  • नया loan: settlement के बाद वही bank एक cooling period तक आपको नया loan नहीं देगा; खेती के क़र्ज़ को छोड़कर यह कम से कम 12 महीने है।[1]

Settlement कैसे होता है

Settlement borrower का हक़ नहीं; bank अपने व्यापारिक फ़ैसले से करता है।

  • Bank की policy: हर bank की Board से मंज़ूर policy में settlement की प्रक्रिया होती है, और यह भी कि किस तरह के क़र्ज़ में कितनी छूट दी जा सकती है, गिरवी संपत्ति की आज की वसूली-योग्य क़ीमत देखकर।[1]
  • मंज़ूरी कौन दे: loan मंज़ूर करने वाले से कम से कम एक स्तर ऊपर का अधिकारी या समिति। जो अधिकारी loan मंज़ूर करने में शामिल था, वह उसी खाते का settlement मंज़ूर करने में किसी भी रूप में शामिल नहीं हो सकता।[1]
  • 3 महीने की सीमा: तय settlement रक़म चुकाने का समय 3 महीने से ज़्यादा हो, तो उसे restructuring माना जाता है। आंशिक (part) settlement भी restructuring है।[1]
  • लंबित केस: bank ने किसी न्यायिक मंच पर वसूली का केस किया है और वह लंबित है, तो settlement पर वहाँ से consent decree लेना ज़रूरी है।[1]

Credit report में क्या दिखता है

  • रिपोर्ट होता है: bank, settlement वाले मामले और settlement की वजह, credit bureau (CIC) को तय format में भेजता है।[2]
  • 'Settled' कब: सिर्फ़ तब, जब चुकाने में असमर्थता की वजह से मूलधन, ब्याज या दोनों में छूट दी गई हो।[2]
  • 'Disputed' कब: ग़लत debit या विवादित charges वाले मामले 'settled' नहीं, 'disputed' दिखाए जाते हैं।[2]

आम ग़लतफ़हमी

✕ ग़लतफ़हमी"Settlement माँगना मेरा हक़ है; bank मना नहीं कर सकता।"
✓ सचनहीं। RBI के निर्देशों के मुताबिक compromise settlement borrower का अधिकार नहीं है; यह bank का अपने व्यापारिक फ़ैसले से लिया निर्णय है।[1]
✕ ग़लतफ़हमी"Bank ने loan write-off कर दिया, मतलब क़र्ज़ माफ़।"
✓ सचनहीं। Technical write-off सिर्फ़ bank के खातों का हिसाबी क़दम है। इसमें borrower पर दावा नहीं छूटता, वसूली का bank का हक़ बना रहता है, और borrower की क़ानूनी ज़िम्मेदारी वैसी ही रहती है।[1]
✕ ग़लतफ़हमी"Settlement हो गया, तो credit report साफ़।"
✓ सचनहीं। चुकाने में असमर्थता की वजह से मूलधन, ब्याज या दोनों में छूट मिली हो, तो bank खाते को 'settled' बताता है, ताकि आगे loan देने वाले को यह पता रहे।[2]
✕ ग़लतफ़हमी"किस्तों में settlement भी settlement ही है, चाहे साल भर लगे।"
✓ सचनहीं। तय settlement रक़म चुकाने का समय 3 महीने से ज़्यादा हो, तो उसे restructuring माना जाता है। आंशिक (part) settlement भी restructuring है।[1]

आपका अधिकार

ग़लत debit या जिस charge पर विवाद है, उसे bank credit bureau को 'settled' नहीं बता सकता; ऐसे मामले 'disputed' दिखाए जाते हैं।[2] और जिस अधिकारी ने आपका loan मंज़ूर किया था, वह उसी खाते का settlement मंज़ूर नहीं कर सकता।[1]

अभी क्या करें

  • Settlement से पहले देखिए कि तय रक़म कितने समय में चुकानी है: 3 महीने से ज़्यादा हुआ, तो यह restructuring माना जाएगा।[1]
  • Settlement के बाद अपनी credit report देखिए कि खाता सही status ('settled' या 'disputed') में दिखा है।[2]
  • वसूली का केस किसी न्यायिक मंच पर लंबित है, तो settlement पर consent decree होना चाहिए।[1]

सवाल-जवाब

Settlement के बाद उसी bank से नया loan कब मिल सकता है?Bank की policy में तय cooling period के बाद। खेती के क़र्ज़ को छोड़कर यह कम से कम 12 महीने है, और bank इससे लंबा रख सकता है। खेती के क़र्ज़ में cooling period bank की policy तय करती है।
Settlement की रक़म कैसे तय होती है?Bank की Board से मंज़ूर policy से। उसमें लिखा होता है कि अलग-अलग तरह के क़र्ज़ में कितनी छूट (sacrifice) दी जा सकती है; यह गिरवी संपत्ति की आज की वसूली-योग्य क़ीमत देखकर तय होता है, जहाँ गिरवी हो।
Technical write-off क्या है?Bank का हिसाबी क़दम, जिसमें न वसूल होने वाला क़र्ज़ (पूरा या आंशिक) सिर्फ़ खातों में write-off होता है। Borrower के loan खाते में बकाया बना रहता है, और दावा नहीं छूटता।
Fraud या wilful defaulter घोषित borrower से भी settlement हो सकता है?हाँ, bank कर सकता है। पर उनके ख़िलाफ़ चल रही आपराधिक कार्रवाई जारी रहती है, और fraud / wilful defaulter पर लगने वाले penal measures भी लागू रहते हैं।
Lok Adalat में settlement की क्या सीमा है?Civil court की Lok Adalat में ₹20 लाख तक के मामले भेजे जा सकते हैं। DRT / DRAT की Lok Adalat में bank ₹10 लाख और उससे ऊपर के मामलों में हिस्सा ले सकता है। ₹10 लाख से कम के personal loans, credit card loans और housing loans की वसूली के लिए bank को Lok Adalat इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित (encourage) किया गया है।
NBFC से लिए loan पर?इस पन्ने के नियम commercial banks के निर्देशों से हैं। NBFC के लिए RBI के अलग Resolution of Stressed Assets और Credit Information Reporting निर्देश हैं।

जुड़े शब्द

स्रोत

  1. RBI — Reserve Bank of India (Commercial Banks – Resolution of Stressed Assets) Directions, 2025 (RBI/DOR/2025-26/165; DOR.STR.REC.84/21.04.048/2025-26; updated as on October 1, 2026; small finance, payments और local area banks पर लागू नहीं), PDF ↗जारी: 28 नव 2025 · लागू: 28 नव 2025किस बात के लिए, दस्तावेज़ का कौन-सा हिस्सा
    • पैरा 3लागू किस पर: commercial banks
    • पैरा 6(2)compromise settlement: नक़द में पूरा निपटारा; बकाये का कुछ हिस्सा छोड़ना
    • पैरा 6(12), 90, 913 महीने से ज़्यादा में भुगतान, या आंशिक settlement = restructuring
    • पैरा 6(18), 92technical write-off में दावा नहीं छूटता
    • पैरा 12policy: छूट, गिरवी की क़ीमत; एक स्तर ऊपर मंज़ूरी; loan मंज़ूर करने वाला शामिल नहीं
    • पैरा 88settlement borrower का अधिकार नहीं, bank का फ़ैसला
    • पैरा 96cooling period: कम से कम 12 महीने; खेती के क़र्ज़ में policy
    • पैरा 98, 99fraud / wilful defaulter: आपराधिक कार्रवाई और penal measures जारी
    • पैरा 101, 102लंबित केस में consent decree; Lok Adalat की सीमाएँ
  2. RBI — Reserve Bank of India (Commercial Banks – Credit Information Reporting) Directions, 2025 (RBI/DOR/2025-26/156; DOR.FIN.REC.No.75/20.16.056/2025-26; Updated as on July 01, 2026; small finance, payments और local area banks पर लागू नहीं), PDF ↗जारी: 28 नव 2025 · लागू: 28 नव 2025किस बात के लिए, दस्तावेज़ का कौन-सा हिस्सा
    • पैरा 3लागू किस पर: commercial banks
    • पैरा 12(2)settlement और उसकी वजह credit bureau को
    • पैरा 12(4)'settled' सिर्फ़ असमर्थता से छूट पर; ग़लत debit / विवादित charge 'disputed'
  3. RBI — Master Directions की सूची, www.rbi.org.in ↗किस बात के लिए, दस्तावेज़ का कौन-सा हिस्सा
    • NBFC का हिस्साNBFC के अलग Resolution of Stressed Assets और Credit Information Reporting Directions, 2025 (12 अक्टूबर 2026 को देखी)

सुधार का इतिहास

  • पन्ना बना। RBI के Commercial Banks – Resolution of Stressed Assets Directions, 2025 (1 अक्टूबर 2026 तक updated) और Commercial Banks – Credit Information Reporting Directions, 2025 (1 जुलाई 2026 तक updated) से जाँचा।

पन्ना बना: 12 अक्तू 2026 · आख़िरी जाँच: 12 अक्तू 2026
यह सामान्य जानकारी है, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं।

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